एआइको सहयोगबाट तयार पारिएको सांकेतिक तस्बिर ।
माई के चुनरी में रथवा सजा के,
नगर-नगर माई के परिक्रमा करावे के बा।
भक्ति के दीप हर हृदय में जलावे के बा,
ना भूले के बा, ना भुलाए के बा,
अपने सभिन के गहवा माई के रथ यात्रा में आवे के बा।
चुनरी में लपेटल पावन कलश,
हाथ-हाथ में शेरावाली अंकित ध्वजा।
"जय गहवा माई" के जयकारा गूंजे,
पूरा बिरगंज के भक्ति रंग में रंगावे के बा।
ना भूले के बा, ना भुलाए के बा,
हर घर से माई के भक्तन के आवे के बा।
फूल, अक्षत, नारियल, चुनरी लेके,
माई के चरणन में अर्पण चढ़ावे के बा।
दादा-दादी,
माई-बहिनी, भइया-भौजी,बच्चा, नौजवान सभे, शामिल होखेके बा ।
ना भूले के बा, ना भुलाए के बा,
अपने परिवार संगे मैयाँ के दरबार मे जरूर आवे के बा।
ढोल, नगाड़ा, शंख आ घंटी,
माई के स्वागत में बजावे के बा।
भक्ति, नाच, गान आ जयकारा से,
पूरा बिरगंज के माईमय बनावे के बा।
ना भूले के बा, ना भुलाए के बा,अपने सभिन के गहवा माई के रथ यात्रा में आवे के बा।
रचनाकार: दिपक सर्राफ रानीघाट-११, वीरगञ्ज